Friday, March 14, 2008

What do we want?

It looks like a never ending chain.


सूरज को धरती तरसे,


धरती को चन्द्रमा ।


पानी में सीप जैसे,


प्यासी हर आत्मा।


बूँद छुपी किस बादल में


कोई जाने ना।


No one knows where will I get what I want.


I thought I got everything.


सब कुछ मांग लिया तुझको मांग कर।


उठते नहीं हैं हाथ मेरे इस दुआ के बाद।


But I guess I am not that wrong.

No comments: