Saturday, January 19, 2008

दिल ढूँढता है .....


बर्फीली सर्दियों में , किसी भी पहाड़ पर,
वादी में गूंजती हुई, खामोशियाँ सुने,

आखों में भीगे भीगे से लम्हे लिए हुए...

दिल ढूँढता है, फिर वही फुरसत के रात दिन ...
बैठे रहें तस्सवुर-ए-जाना किये हुए


जाडों कि नर्म धूप और, आँगन में लेट कर,
आखों पे खींच कर तेरे, दामन के साए को,
औंधे पड़े रहे कभी करवट लिए हुए...

दिल ढूँढता है, फिर वही फुरसत के रात दिन ...

या गर्मियों की रात जो पूरवायीयाँ चलें ,
ठंडी सफ़ेद चादरों पे, जागे देर तक,
तारों को देखतें रहे, छत पर पड़े हुए ।

दिल ढूँढता है, फिर वही फुरसत के रात दिन ... बैठे रहें तस्सवुर-ए-जाना किये हुए

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